આમ તો હું સાવ કરતાં સાવ ભૂલકણો છું ....
કોણ જાણે મારી યાદ દાસ્તમાં બ્લાસ્ટ થાય છે ...
અને બ્લાસ્ટ થતાં જ "અનંત"ની કોઈ શીતળ આગ ભભૂકતી રચના સપાટી ઉપર આવી જાય છે ...
ભૂતકાળ ની અને વર્તમાનની ઘટના એક સમાન હોય ત્યાં...
"અનંત"ના જૂના શબ્દોનો સામાન હું ગોઠવી દઉં ....
બ્લાસ્ટ :-
"અજ્ઞાની"ક્યારેક ઝર્ઝરિત સામાન પણ ઘરની શોભા વધારતો હોય છે.
कल और आज में बड़ा फर्क होता हें ...
जो कल यहाँ हस्ता था आज रोता हें...
मैने यहाँ आके देखा तो दिमाग मेरा चकरा गया..
कुछ घंटो पहेले यहाँ मुझसे कोई बात कर रहा था...
कही ये मेरा भरम तो नहीं.! कोई था भी या में युही
अकेला ही अपनी ही रूह के सामने बडबडा रहा था
यकी नहीं आता मुझे अपनी आँखों पर मगर ये सच हें..!
कोई तो जरुर था यहाँ , मगर जाने क्यों चला गया...
वैसे तो कोई फर्क नहीं पड़ता हें मुझे कोई आये या ना आये,
तकलीफ तब जाके होती हें , जब चला जाए कोई आके यहाँ.
"अनंत" बुरा या भला हुवा ? चलो जो होना था वही हुवा जो
हुवा अच्छा हुवा, इस विध्यार्थीने फिर आज कुछ शिख लिया.
"अनंत" का ही ये शब्द सामान हें ....
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