વર્ષો પહેલાં ભાઈબંધ અનંતે
અલગ અલગ અંદાજમાં લખેલા શૈર...
"अनंत" प्रेम की यही तो पराकाष्ठा है।
कि, सुबह होते ही रात का इन्तजार रहे।
"अनंत"
बंद आंखो से देखे थे जो ख्वाब कभी मैने। खुली आंखो से देखने को उस ख्वाब का इन्तजार रहे।
जो कभी देखी थी अदाए चंद, बंद आंखो से।
खुली आंखो देखु से वो हर अदाए रात मे नई
नई सी हर दिन नए नए जज्बात का इन्तजार रहे।
"अनंत" प्रेम की यही सही पराकाष्ठा है।
कि, हर पल हर दिन रात का इन्तजार रहे।
दिन तेरा पुरा गुजर जाये रसोई मे और घर मे ।
और मेरा दिन पुरा गुजर जाये बहार दफ्तर मे।
घर आके तुजे मीलके चैन - ओ - सुकून मीले दिलको. बाद उसके तुजसे बात का इन्तजार रहे।
प्रेम भरा स्पर्श तेरा मेरा चुंबन और आलींगन मेरा
तेरा और फिर हर रात उसके बाद का इन्तजार रहे।
"अनंत" प्रेम की यही सही पराकाष्ठा है।
कि, हर पल हर दिन रात का इन्तजार रहे।
"अनंत"
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