जो आज मुझे उसी पुराने जर्झरित पन्नो से मिला ....
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तू अनंत की प्यारी है, तू अनंतकी प्यासी है...
और में मिट्टी का बर्तन जिसमे मिठा पानी है...
अपने होठो से लगाके.. तू अपनी प्यास बुजाले..
बूंद बूंद तू होठो से लगाके अपनी प्यास बुजाले ..
बहार चाहे घना अँधेरा ही क्यों ना हो...
भीतर होंगे उजाले ,होंगे भीतर उजाले...
बूंद बूंद तू होठो से लगाके अपनी प्यास बुजाले ..
बहार चाहे घना अँधेरा ही क्यों ना हो...
भीतर होंगे उजाले ,होंगे भीतर उजाले...
जी भरके जी चाहे उतना पीले प्यारी, पीले पानी...
तेरे इस प्यारे बर्तन में मीठा मीठा सा जल है...
लेकिन प्यारी ...
दो हाथो से पकड के जल पीना जरा संभल के...
टूट जाएगा ....
ये बर्तन गर तेरे हाथसे जो छुट जाएगा...
मेरा क्या है . में तो मिट्टी हु मिट्टी में मिल जाऊँगा....
लेकिन....
तू और पानी...!
ना मिट्टी खाली जायेगी ...
ना पानी खाली जाएगा...
पुरानी मिट्टी नया रूप धरेगी ...
और फिर ! प्यार ही तो करेगी....
और पानी.....
पानी भी ! कही न कही जमी पर बहे जाएगा ...
और मिट्टी में ही मील जाएगा.
फिर मिट्टी और पानी दोनों मिलके एक हो जाएगा ...
पानी जहा जहा गिरेगा वहा एक नया गुल खिलायेगा....
और मेरी प्यारी तू ...!
रहे जायेगी प्यासी तू...!
इस जनम में भी .!
प्यासी थी प्यासी रहे जाएगी.
लेकिन मेरी प्यासी मेरी प्यारी ...
बे फिकर रहेना ,तू फिकर ना करना...
"अनंत" जीवन है ,जीवन "अनंत" है...
मै फिर वापस आऊंगा .....
ताजा मीठा पानी अपने भीतर भरके लाऊंगा ...
में मिट्टीका बर्तन फिर वापस आऊंगा...
और तेरी "अनंत"... प्यास बुजाऊंगा.....
"अनंत"
"अनंत" का ये रचना बार बार दोहराना मुझे बड़ा अच्छा लगता है प्यारा लगता है...
अनंत का ये शेर...
ब्लास्ट :-
उम्र भर नहीं मिटती "अनंत" ये दो भूख ...!
एक प्रेमी की इच्छा और दूजे प्रेमी से हूँफ..!
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