*ब्लास्ट* फॉर भाइबंध ....
"दस्तक"
*******
दस्तक
हर वक्त
आ कर
दर तक
देता है
कोई ना कोई
"अनंत"
खुल्ले दरवाजे पर
कोई सुने कैसे
आवाजे दस्तक
जब की खाली हो घर
"अनंत"
"दस्तक"
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दस्तक
हर वक्त
आ कर
दर तक
देता है
कोई ना कोई
"अनंत"
खुल्ले दरवाजे पर
कोई सुने कैसे
आवाजे दस्तक
जब की खाली हो घर
"अनंत"
हर वक्त देता हे, कोई ना कोई दस्तक !
"अनंत" खाली घर के खुल्ले दरवाजे पर !
"अनंत" खाली घर के खुल्ले दरवाजे पर !
फीर...,
गुंगा बोला...
बहेरे ने सूना...
और अंधे ने देखा...
और लंगड़ा दौड़ा
ऐसा भरम...!!!
हाये....
कैसा भरम...
हूवा मुजे...
हो खंधा, अंधा या देखता, भक्त...
देखो जरा आज तक पर दस-तक...
देखो जरा आज तक पर दस-तक...
दो अर्थ मे...
दस-तक...
दस्तक...
यानी....
टकोर...
सायद सारे बीकाउ...
कुछ/कोई अपवाद हो शकता है...
वैसे तो सारे के सारे खोटे सिक्के...
हर सिक्के का दूसरा पहेलु होता है...
और फीर सब पेसे का खैल है...
भरोसा इस पर, या उस पर करना बेकार...
क्युकी...
कोई भी.! कभी भी.! कुछ भी.! बोलता है..! बोल शकता है,
बोल कर पलमे पलट शकता है, बदल भी शकता है.!
ये तख्ता कभी भी पलट शकता है ।
ऐसे मे सच जुठ को परखना बडा ही मुश्किल...
लेकीन.... फीर भी..!
ऐसे मे कुछ, बहोत कुछ सच सामने आ जाता है...
जो अंधो की आंखे भी,
फोड के धूस जाता है आर पार...
ऐसे मे भला देखता चुप कैसे बैठता ...
ब्लास्ट :-
सबको ये भरम हो रहा है...
की दूनिया वो बदल रहा है...
की दूनिया वो बदल रहा है...
भरभ चल रहा है।
जग बदल रहा है।
जग बदल रहा है।
भरम यु ही बस चल रहा है..
जग तो आप ही बदल रहा है...
जग तो आप ही बदल रहा है...
वक्त ही कुछ ऐसा चल रहा हे।
वक्त सबको कुछ यु छल रहा हे..
वक्त सबको कुछ यु छल रहा हे..
उसकी वजैसे बदल रही हे दूनिया,
ये सोच के मुर्ख मन मे मचल रहा है।
ये सोच के मुर्ख मन मे मचल रहा है।
जब की,
खूदको बदलने के ईलावा...
यु तो कुछ बदलना आसा नही...
हा, प्रलय ही विकल्प है आखरी...
हा, प्रलय ही विकल्प है आखरी...
फीर गुंगी कलम कतीरा की थोडा कुछ बोल के,
चुप हो गई ...
और बर्षो पहेले बहोत बोलती कलम यार की,
जो बोली थी, वो बोल उठी...
जो बोली थी, वो बोल उठी...
और कभी अपनी कीसी चहीती से,
बर्षो पहेले जो बोली थी भोले की,
वो भोली कलम
वो, भूली बात फीर याद आ गई...
बर्षो पहेले जो बोली थी भोले की,
वो भोली कलम
वो, भूली बात फीर याद आ गई...
ब्लास्ट :-
ऐसा भरभ हुवा मुजे...
जैसे मैने छुआ तुजे...
जैसे मैने छुआ तुजे...
"अनंत" तेरे ईश्कमे...
हा, कुछ ऐसे डुबा हु मे..
हा, कुछ ऐसे डुबा हु मे..
"अनंत "
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" अनंत " वो जो थोडे दिन चुप रहता हे
फीर एक दिन एक साथ बहोत बोलता हे।
फीर एक दिन एक साथ बहोत बोलता हे।
" अनंत "
खैर...
ये उनकी बाते हे, मेरी बात और है,
सुनो गौर से...
फीर...,
गुंगा बोला...
बहेरे ने सूना...
और अंधे ने देखा...
और लंगड़ा दौड़ा
फीर भी वो वैसे के वैसे ही रहे, जैसे थे..!
क्यु की अब बदलना मुश्किल था.!
थूंक कर चाटना और भी मुश्किल..
थूंक कर चाटना और भी मुश्किल..
क्यु की ना वो गुंगा था ना बहेरा ना अंधा...
खंधा बोलता सुनता देखता ही था सब.!
खंधा बोलता सुनता देखता ही था सब.!
लेकीन...
दिखाना कुछ और था।
दिखावा कुछ और था.!
दिखाता कुछ और था..!
और उपर से मुर्ख प्रजा.!
फीर.., क्या कहेना, है ना.!
दिखावा कुछ और था.!
दिखाता कुछ और था..!
और उपर से मुर्ख प्रजा.!
फीर.., क्या कहेना, है ना.!
ये सच था। भरम न था मेरा....
खैर....
फीर बर्षो पहेले बहोत बोलती कलम यार की,
जो बोली थी बोल उठी...
जो बोली थी बोल उठी...
और ऐसा भी कुछ महसूस हुवा।
जैसे तूने हलके से हो छुआ मुजे।
जैसे तूने हलके से हो छुआ मुजे।
"अनंत " तु आके कभी देख जरा,
कीस कदर तेरे प्यारमे खोया हु मे।
कीस कदर तेरे प्यारमे खोया हु मे।
" अनंत "


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