उस दिन सुबह से मुझे रात होने का इंतजार था जाने क्यु.
बहोत सी बाते करनी थी कुछ सवाल उठ खड़े थे ,
जिसका जवाब मुझे उन दोनों मेसे किसिना किसीके पास से लेना था ,
और आखिर दिन ढला रात हुई और मै चाय लेके निकल पड़ा महोल्ले की और.
थर थाराती ठंड में कम्बल ओढ़के अँधेरी गलिको चीरते हुवे आखिर पहोच ही गया.
खंडर के अंदर...
दर हमेशा की तरहां आधा खुल्ला था. पूरा खोले बिना ही मै अंदर घुस गया और ,
दरवाजा बंध कर दिया ,
वो दोनों भी जैसे मेरा इन्तजार कर रहे थे .
अज्ञानी बोला आ गया ना ठिकाने वो ऐसे बोला जैसे मेरे भीतर के हालत समज गया हो .
मैने कहा , हां आ ही गया ...
पर आज तुने दरवाजा क्यों बंध किया परिया ?
अज्ञानी ने अपनी दाढ़ी पर मुश्कुराते हाथ फिराते पूछा .
मै कुछ बोलू इससे पहेले अनंत बोला .
अच्छा किया बहोत अच्छा किया .
अब के ऐसा ही करना परिया.
अपनी खुर्शी पर बैठते हुवे मैने कहा . हां अनंत मैने भी यही सोचा है.
ख़ैर... अज्ञानी बोला . अब जल्दीसे चाय की पियाली भर यारा बहोत भारी ठंड लग रही है.
अनंत ने टीपॉय पर उल्टी पड़ी पियाली सीधी करके भरदी.
अपनी अपनी पियाली हाथमे लिए चियर्स करके पियाली होठोपे लगाईं की अनंत बोला
ओए परिया आज क्यों तेरा मु लटका हुवा है .
मैने जोरसे चायकी चुस्की लगाईं . कुछ नहीं यार ...
कुछ तो है .
हां है भी और नहीं भी ..
अज्ञानी बोला,..! अबे पहेलिया मत बुजा हम सब जानते है.
अच्छा क्या जानते हो तुम बतावो.
अनंत बोला , वही जो तु नहीं जानता.
लो अब तुम भी वही करने लगे.
अज्ञानी बोला , बस आज ऐसा ही होगा.
मैने कहा , पर कुछ तो समज में आना चाहिए की नै..
चाय की चुस्की मरते हुवे अज्ञानी बोला,
तु चुप होजा सब ठीक हो जाएगा .
हां .. बिलकुल बोलना बंध करदे, अनंत ने कहा.
मैने अनंत से पूछा , अच्छा मेरे ना बोलने से क्या होगा बतावो.
अनंत हसकर बोला यार परिया ....
वो होगा जो तेरे बोलने से नहीं होता .
ठीक है फिर चलो मै चुप हो जाता हु.
अज्ञानी ने पूछा ,,, हो गया ?
मैने मु खोले बिना कहा हु... हु ..
अनंत अबे हु..हु.. क्या करता है तुजे अज्ञानी पूछ रहा है तु सचमे चुप हो गया क्या .. ?
फिर मैने मु खोले बिना कहा हु... हु ..
अज्ञानी ओए तुजे अनंत पूछ रहा है तु सचमे चुप हो गया क्या .. ?
मुझे गुस्सा आ गया .. और मैने उन दोनों को चिल्ला ते हुवे कहा .
यार अजीब हो तुम दोनों.
पहेले चुप कराते हो फिर बार बार बोलने पर मजबूर करते हो .
दोनों साथ मिल कर जोरसे हसने लगे और फिर एक दूसरे को ताली देते हुवे .
वही तो अब समजा ना..! यही करती है दुनिया.और ये दुनिया वाले.
पहेले चुप करदेते हें बाद में बोलने पर करते है मजबूर.
पहेले पास आते है फिर कहेते हें चलो अब हो जावो दूर.
"अनंत" इस दुनिया से युही दूर कोने मै नहीं बैठा, जान,
गया हु मै इस जालिम दुनिया वालोका जालिम दस्तूर..
ऐ..ऐ.. अनंत एक मिनिट रुक यारा मुझे लिख लेने दे..
तुने मेरे मनकी बात कहे दी मुझे लिख लेने दे..
में खड़ा होके कागज कलम लेने जा रहा था की...
उसने मुझे खींचके फिर खुर्शी पर बिठाते हुवे कहा ..
अबे छोड ना यार कुछ नहीं लिखना अभी....
क्या जरुरी हें,.? सब लिख लेना फिर कभी .
याद आये तो ठीक है वर्ना भूल जाना सभी.
हमें कहा दुनिया को दिखाना समजाना है .
हमें तो बस अपनी मस्ती में डूब जाना है.
फिर बोला फिर बोला तु कुछ लिखने जैसा .
में फिर उठने गया उसने फिर बिठा दिया .
अरे यारा उतावला बावला मत बन इसमें कुछ नहीं है ..
ये सारी आम बाते है तुजे लिखना ही है तो लिख अभी जो में लिख वाऊ .
तेरे प्रश्न का हल उसीमे कही छुपा होगा .
अज्ञानी ने पानी पिते हुवे कहा अब केसा लगता है बता ?
अरे यार मजा आ गया साला बहोत मजा आ गया.
फिर .. !
लोग खुद ही से दूर भागते हें और रबसे करीब होना चाहते है .
"अज्ञानी" वैसे खुद ही में खुदा होता हें छुपा. वो कहा कोई जाने है.
अनंत ने कहा ,,, अज्ञानी कुछ बोला तुने सुना ?
हां.. सुना, मैने धीरेसे कहा.
कुछ समजा भी या ... ?
मै चुप चाप खड़ा होके कागज कलम ले आया ...
और अपनी खुर्शी पर बैठ गया ....
यार अनंत मुझे ये बता आखिर इश्क चीज क्या है... ?
देखा .. देखा .. अज्ञानी आखिर दिलकी बात इनके होठो पर आ ही गई...
हां अनंत मै तो कबसे देख रहा हु, अब तु इसे कुछ इश्क के बारेमे बता.
हां क्यों नहीं आज वैसे भी हमें इसके खातिर इश्क के खातिर कुछ तो करना ही पड़ेगा.
चल परिया उठा कागज कलम और लिख ...
हां बोल मैने हाथ में कागज़ कलम संभालते हुवे कहा.
और वो बोला ...
ये इश्क शराब के जैसा है, हर किसीओ अकसर लुभाता है.
ये इश्क नशा है बार बार चढता है बार बार उतर
जाता है.
जनुने इश्कमे कोई संवर जाता हें तो कोई बिखर
जाता है.
इश्के जूनून जब चडता है आदमी हर हदसे गुजर जाता
है.
जब इश्के जूनून उतर जाता है. आदमी जैसे मर जाता
है.
फिर कोई भटक जाता है, कोई अपने भीतर उतर जाता
है.
यातो पागल हो जाता है या बहोत ही समजदार हो जाता है.
यातो पागल हो जाता है या बहोत ही समजदार हो जाता है.
बहोत सा ज्ञान इन्सानको इश्कमे ही ठोकर खाकर आता
है.
इस गली तक आते आते क्यों थम से गए कदम आपके.
क्या डर है आपको की इस गलीमे हमारा भी घर आता
हें?
लिखता हु इश्के हकीकत भुलानेको मगर फिर याद आता है.
बिता हर पल इश्कमे इस कदर आंखमे अश्क उभर आता
हें.
मै और अज्ञानी उछल पड़े यार मजा आ गया.
अनंत रुक रक एक आखरी शेर मुझे बोलने दे
आखिर क्या बात है ऐसी तुजमें ”अनत”की कोई अजनबी,
छोडके अपनी हवेली खींचता हुवा इधर खंडर पर आता है.
"अनंत"
मुझे क्या मालुम मै तो किसीको बुलाने लुभाने जाता नहीं.
ऐ अनंत कुछ बात बनती है बना यार और एक गझल बना.
चल चल अब जा जाके सोजा देख अज्ञानी तो वही खुर्शी पर ही लुडक गया.
क्यों ना सो जाये...वो जानता है बेकार की बातो में टाइम खराब नहीं करते.
चल मुझे भी नींद आती है.
ठीक है तो मै चलता हु और उसे खुर्सिसे उठाकर निचे सुला देना.
हां हां तु जा उसे मै संभाल लूँगा.
और हां दरवाजा खुल्ला मत रखना ..
अब बंध ही रखना ..
कही घुस जायेगी तो बीमार कर देगी ...
ठंड बहोत है ...
हां परिया हां अब तु जा हमारी फिकर मत कर .
तु ठिकसे कम्बल ओढ़ले...
हां,, हां ,, वर्ना मै भी...!
मै ठंड में थरथराता अपने घरकी और चला....

2 comments:
Koi ishq se bikhar jaata hai ..tab koi dost aakar haath thaam leta hai
Tu khushnasib hai tere paas anant hai ...
Muj kaisa to andhero main bhatal jaata hai !!
https://www.youtube.com/watch?v=RSAjnqg7OeE&feature=youtube_gdata_player
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