https://youtu.be/c87oQt5HCd8?si=RShKyEYidABVP6H_
https://youtu.be/YpX2Nrvx_ek?si=QcrjMdraiMmQdUxM
अनुभुती भी ठीक है वैसे तो उपस्थित का भी बहुत महत्व है।
આ તો ઓલો પાગલ ભાઈબંધ કેતો એટલે કૌ છું ભાઈબંધ કે'તો કે,
अपनत्व का ये अनुभव एक परम चरम अखंड "अनंत" अलौकिक और सुक्ष्म स्वरूप होता है।
और उसका सुक्ष्म अहेसास भी परम चरम अखंड अनंत अलौकिक आनंद देता है।
"अनंत" जब पास हो तब खुद से ज्यादा उसकी उपस्थिति अच्छी लगे ।
और जब "अनंत" दूर हो तब खुद से ज्यादा उसकी अनुभुती अच्छी लगे ।
उसकी उपस्थिति और अनुभुती स्वंय से भी अधिक अच्छी लगे वही
"अनंत" अपनत्व है..."
"अनंत"
तो चलिए, इस अलौकिक भाव को "अनंत" और "अज्ञानी" के संवाद के रूप में ढालते हैं। जहाँ अज्ञानी अपनी इसी दुविधा और अनुभूति को अनंत के सामने रख रहा है:
"अनंत" और" अज्ञानी" के संवादरात का सन्नाटा गहरा था। अज्ञानी शांत बैठा था, पर उसके भीतर विचारों की एक सूक्ष्म नदी बह रही थी। उसने सामने बैठे अनंत की ओर देखा, जिसकी आँखों में एक असीम ठहराव था।
"अज्ञानी"अनंत, इस संसार में लोग अपनत्व की बड़ी बातें करते हैं। कोई कहता है साथ होना जरूरी है, कोई कहता है यादों में जीना जरूरी है। किसी ने लिखा था कि जब किसी की 'अनुभूति' स्वयं से अच्छी लगे, वही अपनत्व है। पर मुझे यह परिभाषा कुछ अधूरी सी लगती है।"
"अनंत"ने मंद मुस्कान के साथ पूछा, "तो तुम्हारे भीतर अपनत्व का क्या स्वरूप उभरता है, अज्ञानी?"
"अज्ञानी" मेरे भाईबंध कहते हैं, और अब मैं भी यह महसूस करता हूँ कि अपनत्व का एक परम, चरम, अखंड और सूक्ष्म स्वरूप होता है। इसमें केवल अनुभूति नहीं, बल्कि उपस्थिति का भी उतना ही महत्व है।"
वह थोड़ा और करीब आते हुए बोला:"जब तुम पास होते हो अनंत, तब खुद से ज्यादा तुम्हारी 'उपस्थिति' अच्छी लगती है। ऐसा लगता है जैसे मेरा होना तुम्हारे होने में विलीन हो गया हो। और जब तुम दूर होते हो, तब खुद की तन्हाई से ज्यादा तुम्हारी 'अनुभूति' अच्छी लगती है। तुम्हारी यही उपस्थिति और अनुभूति जब स्वयं से भी अधिक प्यारी लगने लगे... वही तो 'अनंत' अपनत्व है।"**
*अनंत* ने अज्ञानी की बात सुनी, उसकी आँखों में एक अलौकिक चमक उभर आई। उसने अज्ञानी के कंधे पर हाथ रखा और कहा:
"अज्ञानी, तुमने अपनत्व के उस बारीक धागे को छू लिया है जिसे लोग अक्सर भूल जाते हैं। जहाँ दूरी और नजदीकी का भेद ही मिट जाए, और हर हाल में केवल उस परम तत्व का अहसास ही स्वयं से बड़ा लगने लगे, वही तो शाश्वत प्रेम है। तुमने 'अपनत्व' को शब्दों से परे ले जाकर 'अनंत' कर दिया।"
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