और किसी के जैसा नहीं बस अपने जैसा हुं मे।
भला हू बुरा हू आप जैसा समजे
हां वैसा हू में.
मेरा कुछ भी कैसा भी लगना आपको,आप ही पर है,
नीर्भर। आपको आप ही की भली या बुरी
सोच के
मुताबिक दिखता हू में.
अब छोटी मोटी परेशानियों से
में घभराता नहीं. अपनी मस्ती मे गाता हू ,नाचता हू, हंसके जिंदगी गुजारता हू में.
अब बात किसी की भली या बूरी नहीं
लगती मुजको।
“अनंत” अब इस कदर अपनी ही मस्तीमे
खो चूका हू में.
अब कोई मेरा हो या ना हो
कोई फर्क नहीं पड़ता।
मुझे जिसका होना था बस
उसीका हो चुका हू में.
बहोत तरसा बहोत तडपा प्यार और यार के लिए अब मगर“अनंत”
अपने आपको ही अपना यार और प्यार समज के
अपने ही इश्कमें खुद को डुबो चूका हू में.
"अनंत"
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