बर्षो पहेले.....
मेरे दोस्त अनंत ने चाय पीते पीते
अपने बारे मे मुजे आधा सच बताते हुए
कहा था कि
यहां वहां पागल की तरहा
जो मुजे ढूंढता है।
बस ऊसीको मीलता हु मै।
हो के पागल
करता है जो तलाश मेरी
बस उसीको खोजता हु मै।
ये वो मस्ती हे...
जो मुजे ढूंढता है।
बस ऊसीको मीलता हु मै।
हो के पागल
करता है जो तलाश मेरी
बस उसीको खोजता हु मै।
ये वो मस्ती हे...
जो किस्मत से मिलती हे....
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में,
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हु में.
चलो आज कुछ अपने बारेमे बोलता हू में.
“अनंत” आधा
भेद आज खोलता हू में.
शब्द खुद ब खुद मेरे पास आ आते हे.
ना ज्यादा कभी सौचता हू में.
कुछ अलग ही नशा होता हे.
जब भी लिखने बैठता हू में.
अपने भीतर दिया जलाके.
अपनी अलौकिक दुनियामे जाके.
तब तक लिखता हू में.
जब तक की ना थक जाता हू में.
अपनी इस दुनियाका बादशाह हू में.
आज एक किस्सा सुनाता हू में.
और एक हकीकत बताता हू में.
और एक हकीकत बताता हू में.
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
एक अधूरा सा किस्सा हू मे.
थोडा थोडा सबका हिस्सा हू में।
बच्चे, बडे, बुढे और लडकियां कई ये वो तुम
और भी हे कई मेरे चाहने वाले.
हर किसीका एक एक टुकड़ा हू में.
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
कोई बुज न पायेगा मुझे एक पहेलिके जैसा हू में.
तिन हिस्से हे मेरे पहेला, दूसरा,
तीसरा, हू में.
पहेलेमे दूसरेमे या तिसरेमे ?
पहेलेमे दूसरेमे या तिसरेमे ?
में भी भूल चुका हू अब तो
की इन तीनों मे से न जाने किस हिस्सेमे छिपा हू में
की इन तीनों मे से न जाने किस हिस्सेमे छिपा हू में
कोई नहीं चाहता अधूरा अधूरा मुझे
हर कोई चाहता हे पूरा का पूरा मुझे.
अब कहा, केसे,
किसके पास जाऊ में ?
जबकी लगता मुजे भी अभी की बहोत अधूरा हु में.
ज्ञान जबतक की पूर्ण ना हो केसे कहू की पूरा हू में .
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
हर किसीको नजर
आई हे सिर्फ बदी मुजमे.
चंद लोगोने देखि हे लेकिन नेकी भी मुजमे.
खुशी सब ढूंढे मुजमे अपनी अपनी.
पूछे ना कोई मुझे की क्या हे खुशी मेरी.
लेकिन फिर भी हर किसीको खुश देखना चाहता हू
में.
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
कोई कहे भला तो किसीको लगता बहोत बुरा हू में.
अपनी अपनी सौच
के मुताबिक़ सब देखे समजे मुझे.
हर किसीको अपनी सौच के मुताबिक़ दिखता हू में.
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
हर पल सबसे अलग ही सौचता हू में.
वैसे अपने आपमें भी सबसे अलग दीखता हू में.
और अलग ही अंदाज से यारो जीता हू में.
कई चाहने वालोके दिलमे रहेता हू में.
तो किसी
किसीकी आंखमे चुभता हू में.
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
वैसे तो में बहोत कुछ हू, फिर भी कुछ
भी नहीं.
किसी एक ने पहेचान लिया कम ये सुख भी नहीं.
अब और कोई जाने, ना पहेचाने
मुझे दू:ख भी नहीं.
किताब की तरह हर किसी के सामने कहा खुलता हू
में.
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
वैसे हर एक हिस्सा मेरा हे, फिर भी मेरा
हिस्सा कोई नहीं.
किस्सा हर एक मेरा हे लेकिन. फिर भी मेरा
किस्सा कोई नहीं.
मेरे हर एक हिस्से को और किस्से को अलग अन्दाजसे देखता हू में .
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
“अनंत” कलम ही जिंदगी हे मेरी और कविता जीवन संगिनी.
कविता हो चुकी हे मेरी और कविताका हो चूका
हू में.
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
मंझिल को में क्यों ढूंढूं भला मंझिल ही क्यों न ढूंढे मुझे.
और मंझिल पाके करना क्या ? लेना हे
मुझे सफरका मजा.
"बस इसी लिए “अनंत” कालसे “अज्ञानी” की तरहां भटकता हू में."
ये जो पूरा तुम्हे दिखता हू में.
तुम क्या जानो की कितने हिस्सोमे बटा हू में.
“अनंत”

3 comments:
Ye to main hu...
Aap bhi??
Kya anant hu main?
Ye padhte laga tum ne mere baare main likha hai??!!!
Sachmuch kitne hisse main bati hu main!
फीर अचानक यहां आ गया तो, वही भ्रमण और वही भ्रम।
आज यहां आये कीतने साल गुजर गये।
गुजरते गुजरते "अनंत" काल गुजर गेये।
मैने महेसुस कीया आज यहां आके की,
औरो की तरहा अब आप भी बदल गये।
"अनंत"
ने बर्षो पहेले ऎसा अपनी कीसी
बदली बदली सी चहीती से कहा था।
खैर मेरा क्या है। मै भी तो नही।
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