मुझे पता नहीं तू कब यहाँ आएगी .
लेकिन दृढ विश्वाश हे आज नहीं तो कल तू जरुर यहाँ आ जाएगी ...
अब कब आएगी तू
आएगी भी या नहीं आएगी वो मुझे मालूम नहीं ...
आएगी भी या नहीं आएगी वो मुझे मालूम नहीं ...
ख़ैर ...
जब आये तब
सायद ...
तू आएगी ..
और यहाँ आ कर ,
तू पढ़े तो ठीक है ,
वर्ना ये बात यहाँ से सायद कभी बहार ना जाएगी ...
में देख रहा हु आज कल तू उल्टी गिनती करने लगी है ...
वैसे उसमे तेरी कोई गलती भी तो नहीं है ..
में तेरे साथ इस कदर पैस आया हु अकसर ...
मगर...
में क्या करता ...
एक तो मै ठहेरा मर्द , और फिर गहेरा मर्द ...
सो तुजे हो शके तब तक डूबते को बचाने का मेरा फर्ज बनता है ...
कही तू डूब ना जाए ...
मगर तुजे बचाते बचाते जब में डूबने लगा तो ...
तुजे क्या खबर ...
फिर तेरा क्या होगा और मेरा क्या होगा ...
या तो दोनों के लिए अच्छा होगा या बुरा होगा ...
वेसे मिले तो अच्छा होगा बिछड़े तो बुरा होगा ...
बस यही डर सताता था मुझे यही डर रहेता था अकसर ...
तुजे क्या खबर...
कुवा किसीको डुबाता नहीं !
वेसे तो कुवे में कोई डूबता है ...
प्यार से या हारके .
लेकिन तूने कुवे को डूबते कही देखा है ?
में जानता हु तूने कुवे को डूबते नहीं देखा है ...
में जानता हु तूने कुवे को डूबते नहीं देखा है ...
नहीं देखा ना ?
तो देखले मुझे में डूब रहा हु !
तो देखले मुझे में डूब रहा हु !
क्या तू जानती है ?
सबकी प्यास बुजाने वाले कुवा भी कभी प्यासा होता हे ...
क्या कभी तूने कुवे को प्यासा होते हुवे देखा है ..?
नहीं देखा ना ..?
तो मुझे देखले...
कुवे को भी कभी प्यास लगती हे ...
क्या कभी तूने कुवे को प्यासा होते हुवे देखा है ..?
नहीं देखा ना ..?
तो मुझे देखले...
कुवे को भी कभी प्यास लगती हे ...
तूजे अगर मालुम नहीं ना ,
तो जानले आज , कुवे को भी ! प्यास लगती है ...
तो जानले आज , कुवे को भी ! प्यास लगती है ...
अच्छे और सच्चे प्यासे की ...
जब कोई सुन्दर पनिहारी पानी भरने आती है ना ,
तब वो कुवे के आगे जुकती है और जुक कर कुवे में झांकती है ...
की पानी कितना गाहेरा हे ..
जितना गाहेरा हे उतना ही उसका पानी साफ़ है या नहीं
जितना गाहेरा हे उतना ही उसका पानी साफ़ है या नहीं
बस उसी वक्त जब पनिहारी जुकती है और झांकती हे तब ,
साफ़ कुवे का साफ़ पानी उसका प्रतिबिंब साफ़ साफ़ देखता है ...
जेसे कुवेका पानी उस पनिहारिका फोटू खिचता है ..
और फिर वो तस्वीर कुवा देखता है ...
और फिर...
कुवे को भी उस प्यासी पनिहारिकी प्यास लगती है ...
डुबोने वाला कुवा खुद उस सुन्दर पनिहारिमें डूबने लगता है ..
ये सब ठीक उसी ही तरहा होता है ..
जेसे राह दिखाने वाला कभी खुद भटक जात है...
ऐसी ही कभी कुवा भी प्यासा हो जाता हे ...
ओरो को डुबाने वाला कभी खुद डूब जाता है ...
किसीके प्यार में किसीकी चाह में ...
पता नहीं चलता कब कौन चलने लगता हे किसके साथमे ...
ख़ैर ...
तुजको बचाते बचाते में खुद कब डूबने लगा तुजमे ,
मुझे पता तक ना चला ...
और में बस डूबता गया ...
तुजमे ,
मुझे पता तक ना चला ...
और में बस डूबता गया ...
तुजमे ,
और उसी वक्त तूने उल्टी गिनती शुरू करदी ...
क्या यही...
आखिर में में यहाँ अटका था ..
जाने तू कहा कहा अटकी थी ...
वेसे तू बहोत प्यारे गीत सुनाती थी वो गीत जिसे सुनने को
मेरे कान तरसते थे कभी
और कभी तू
मेरे अधूरे गीत तू पुरे करती थी ...
मेरे शिर्फ़ दो शब्द से तू पूरा गीत समज जाती थी ,
फिर गाती थी और मुझे सुनाती थाई
मेने सोचा तू ये गीत पूरा करेगी ..
क्या यही प्यार हे ..?
लेकिन उसी वक्त से सायद तूने उल्टी गिनती शुरू करदी ...
क्या यही...
आखिर में में यहाँ अटका था ..
जाने तू कहा कहा अटकी थी ...
वेसे तू बहोत प्यारे गीत सुनाती थी वो गीत जिसे सुनने को
मेरे कान तरसते थे कभी
और कभी तू
मेरे अधूरे गीत तू पुरे करती थी ...
मेरे शिर्फ़ दो शब्द से तू पूरा गीत समज जाती थी ,
फिर गाती थी और मुझे सुनाती थाई
मेने सोचा तू ये गीत पूरा करेगी ..
क्या यही प्यार हे ..?
लेकिन उसी वक्त से सायद तूने उल्टी गिनती शुरू करदी ...
और
जो में करता था तू करने लगी ..
जेसा में बोलता था तू बोलने लगी ...
जेसा में कहेता था तू कहेने लगी ...
जेसे की में हर बार बात बात पर कहेता था मने खबर नथी ..
मने कशु आवडतू नथी ...
बस वेसे ही तू बोलने लगी सब कुछ मेरी ही तरहा..
मेरे साथ थोड़े दिन बात क्या की ,
हो गई तू भी बिलकुल मेरे जैसी .
जेसे मुझे कुछ याद ना रहेता था कभी ..
वैसे तू भी सबकुछ भूलने लगी ...
भूलने लगी ना ..?
तेरा ये बदलाव वैसे तो अच्छा हे !
लेकिन मेरे लिए तो जान लेवा हे !
जेसे की में हर बार बात बात पर कहेता था मने खबर नथी ..
मने कशु आवडतू नथी ...
बस वेसे ही तू बोलने लगी सब कुछ मेरी ही तरहा..
मेरे साथ थोड़े दिन बात क्या की ,
हो गई तू भी बिलकुल मेरे जैसी .
जेसे मुझे कुछ याद ना रहेता था कभी ..
वैसे तू भी सबकुछ भूलने लगी ...
भूलने लगी ना ..?
तेरा ये बदलाव वैसे तो अच्छा हे !
लेकिन मेरे लिए तो जान लेवा हे !
हां , में जानता हु में कभी तेरे साथ सीधा बोला ही नहीं ...
तेरी किसी भी बातका मेने तेरी चाहके मुताबिक़ जवाब दिया ही नहीं ...
पर क्या कभी तूने ये सोचा ?
में ऐसा क्यों करता हु ..!
क्यों की में तोड़ने और टूटने से डरता हु ... !
क्योकि ...
में पहेले भी कई बार तूटा हु और बहोत बिखरा चूका हु !
बड़ी मुश्किल से मैने अपने आप को समेटा हे ..
लेकिन फिरभी अब भी यही कही थोडा बहोत बिखरा पड़ा हु ...
जब में टुटा
फिर मेरे कितने ही हिस्से हुवे...
हर हिस्से के अलग अलग किस्से हुवे ...
अब में वो कहानी सबको सुनाता हु .
बड़ी मुश्किल से मैने अपने आप को समेटा हे ..
लेकिन फिरभी अब भी यही कही थोडा बहोत बिखरा पड़ा हु ...
जब में टुटा
फिर मेरे कितने ही हिस्से हुवे...
हर हिस्से के अलग अलग किस्से हुवे ...
अब में वो कहानी सबको सुनाता हु .
और सायद तू ये भी नहीं जानती भरम बहोत ही अच्छा होता हे .. .
किसी हसी भरम में जीना बहोत अच्छा लगता है...
ये हसी भरम ओ उसका अहेसास बड़ा ही अलौकिक होता है...
किसी हसी भरम में जीना बहोत अच्छा लगता है...
ये हसी भरम ओ उसका अहेसास बड़ा ही अलौकिक होता है...
लेकिन भरम का टूटना बहोत ही बुरा - ओ खोफनाक होता है ..
और क्या तूने कभी भरम यानी सपने टूटने की आवाज सुनी है ..?
नहीं ना .. !?
तो सुनले प्यारी जिस जिस चिजमे टूटने की आवाज नहीं आती ...
उसमे दर्द सबसे ज्यादा होता हे ...
ठीक उसी तरहा दीखता घाव कम दर्द देता हे ...
और छिपता घाव बहोत ज्यादा ...
जब कभी चोट लगे तो खून का बहे जाना अच्छा होता है...
वर्ना चोट लगने पर भी खुनका ना बहेना जान लेवा भी हो शकता है .
वर्ना चोट लगने पर भी खुनका ना बहेना जान लेवा भी हो शकता है .
हां चोट लगने पर भी खून का ना बहेना और भीतर ही रहे जाना ...
खून बहेने से कुछ ज्यादा ही दर्द देता हे ...!
और फिर ऐसे में हमारी फ़रियाद कोई सुनता ही नहीं ...
क्योकि वो छिपा हवा घाव दीखता ही नहीं ...
कौन मानेगा फिर के आखिर दर्द हे किधर ...
कोई चोट तो आती ही नहीं नजर ...
ऐसे ही जब सपने टूटते हे तो आवाज नहीं आती लेकिन ...
आदमी चकना चूर हो जाता है .. मालुम !
और फिर तूने पहेले से ही रोका था टोका था ...
जब हम पहेले पहेले मिले तब ही तूने कहे दिया था ...
ये शिर्फ़ शेर हे शिर पे ना लेना ...
ये सिर्फ गीत है जी मे ना लेना ...
दिलसे ना लगाना इसे ,
बस पढके भूल जाना ..
सो में यही करता रहा अब तक ...
लेकिन ऐसा चलता तो चलता कब तक
दिलसे ना लगाना इसे ,
बस पढके भूल जाना ..
सो में यही करता रहा अब तक ...
लेकिन ऐसा चलता तो चलता कब तक
वेसे मेने भी उसी वक्त तुजे यही कहा था ...
वेसे मेने सिर्फ इतना ही कहा था ...
तू भी !
अब तू ही बता भला में केसे आगे बढ़ता के केसे कदम आगे बढाता ... !
हो शकता हे तेरे दिलमे कुछ नाहो और जेसा तूने कहा वेसा ही हो ...
गीत -ओ -शैर सुनना सुनाना तेरा सिर्फ एक शोख हो ...
जिसमे खुदकी कोई फीलिंग्स , जझ्बात ही ना हो...
और में बहेने लगु तो ...
बस यही सोचके में रुक जाता था...
कदम बार बार तेरी और आनेको उठ रहे थे पर में रोक रहा था ...
क्योकि तूने ही कहा था तूने ही पहेले से मुझे रोक टोक रखा था...
वर्ना ...
हम मर्द तो होते ही ऐसे हे , जरा सा कोई युही मुश्कुरा दे तो हम समज लेते हे ..
युही बातो बातो में मुश्कुराने वाली को हमशे महोबब्त्त हे ...
में जानता हु वेसे की बिना पूछे सोचे समजे ऐसा सोचना गलत है
में जानता हु वेसे की बिना पूछे सोचे समजे ऐसा सोचना गलत है
वेसे में जल्दी जल्दी में ऐसी गलती कभी नहीं करता ...
बहोत सोचता हु संभलता हु संभल संभल कर चलता हु ...
हां में बहोत ही सोच संभल कर चलता हु !
लेकिन आखिरमे तो मै भी फिसलता हु ...
गर्मी के सामने मॉम की तरहा पिघलता हु ...
जब कोई प्यारी सी औरत सामने आये पल पल हर पल ...
और फिर प्यारी सी अदाए दिखाए प्यारे प्यारे गीत सुनाये ...
तो एक मर्द आखिर कब तक संभालेगा खुदको ...
कभी तो आग के सामने पिघल ही जाएगा ना ....
वो तो ध्यान लगा कर बैठा था उनकी तो आँखे भी बंध थी ...
आँखों के बंध होते हुवे भी विश्वामित्र जैसे-
महान तपस्विका भी तपो भंग हो चुका था ...
अति सुन्दर अंग भंगिनी की माल्किन
मेनका के सामने आने से ...
उनके नृत्य करने से
उनकी पायल के झंकार सुनके
जब विश्वामित्र का तपो भंग हो शकता हे तो
भला में किस खेत खी मुली ...
में कोई रूशी मुनि तो नहीं ..
में हु एक आदमी मामूली ...
फिर में कोई तपस्वी तो नहीं ,
भला में कबतक खुदको सयंम में रख शकता ...
फिर मुझे वो गीत याद आ जाता है...
जब जब तू मेरे सामने आये ...
मनका सयंम टुटा जाए...
जब जब तू मेरे सामने आये...
"अनंत" आगमे फिर में भी पिघलने लगा ..
चिकनी सी मिट्टी थी और में फिसलने लगा ...
वैसे ये इश्के दल दल में एक बार जो फिसल जाए ...
फिसलता ही जाए बस फिसलता ही जाए
चाहे तो भी बहार निकल ना पाए ....
हां इश्क दलदल के जेसा ही होता हे.
इश्क दल दल होता हे ऐसा में नहीं कहेता ...
इश्क को दलदल कहेकर में इश्क्की तोहिं नहीं करता ...
क्योकि में जानता हु इश्क ही इबादत हे इश्क ही खुदा है...
इश्क दलदल नहीं बल्के दलदल जेसा होता है..
एक बार एक पैर गर फिसला तो समाजो गए कामसे
फिर बहार निकलने के वास्ते ...
दुसरे पैर के बल पर बहार नेकलने जाए तो और फिसल जाए ...
और बहार निकलने की बजाय और भी भीतर उतरता जाए ...
बस यही नहीं होना चाहिए तेरे या मेरे साथ ...
लेकिन होनी तो होकर ही रहेती हे ना ...
होनी को भला आज तलक भला कौन टाल शका हे..
जब कोई प्यारी सी औरत सामने आये पल पल हर पल ...
और फिर प्यारी सी अदाए दिखाए प्यारे प्यारे गीत सुनाये ...
तो एक मर्द आखिर कब तक संभालेगा खुदको ...
कभी तो आग के सामने पिघल ही जाएगा ना ....
वो तो ध्यान लगा कर बैठा था उनकी तो आँखे भी बंध थी ...
आँखों के बंध होते हुवे भी विश्वामित्र जैसे-
महान तपस्विका भी तपो भंग हो चुका था ...
अति सुन्दर अंग भंगिनी की माल्किन
मेनका के सामने आने से ...
उनके नृत्य करने से
उनकी पायल के झंकार सुनके
जब विश्वामित्र का तपो भंग हो शकता हे तो
भला में किस खेत खी मुली ...
में कोई रूशी मुनि तो नहीं ..
में हु एक आदमी मामूली ...
फिर में कोई तपस्वी तो नहीं ,
भला में कबतक खुदको सयंम में रख शकता ...
फिर मुझे वो गीत याद आ जाता है...
जब जब तू मेरे सामने आये ...
मनका सयंम टुटा जाए...
"अनंत" आगमे फिर में भी पिघलने लगा ..
चिकनी सी मिट्टी थी और में फिसलने लगा ...
वैसे ये इश्के दल दल में एक बार जो फिसल जाए ...
फिसलता ही जाए बस फिसलता ही जाए
चाहे तो भी बहार निकल ना पाए ....
हां इश्क दलदल के जेसा ही होता हे.
इश्क दल दल होता हे ऐसा में नहीं कहेता ...
इश्क को दलदल कहेकर में इश्क्की तोहिं नहीं करता ...
क्योकि में जानता हु इश्क ही इबादत हे इश्क ही खुदा है...
इश्क दलदल नहीं बल्के दलदल जेसा होता है..
एक बार एक पैर गर फिसला तो समाजो गए कामसे
फिर बहार निकलने के वास्ते ...
दुसरे पैर के बल पर बहार नेकलने जाए तो और फिसल जाए ...
और बहार निकलने की बजाय और भी भीतर उतरता जाए ...
बस यही नहीं होना चाहिए तेरे या मेरे साथ ...
लेकिन होनी तो होकर ही रहेती हे ना ...
होनी को भला आज तलक भला कौन टाल शका हे..
ओरो से अलग ही सही लेकिन आखिर तो में भी एक मर्द हु ...
कोई औरत तो नहीं ....
मर्द के सामने अगर कोई सुंदर बार सामने आये मुश्कुराये ...
तो तू ही बता एक मर्द अपने आप को कैसे और कबतक बचा पाए...
और फिर में जानता हु तूने मुजसे परेशा होके ,
मेरी ही तरहा लिखना बोलना शुरू कर दिया ...
वैसे अभी भी में सोच ही रहा हु खुदको संभाले हुवे रखा हु ..
हां थोडा बहोत बहेक भी गया हु ...
और थोडा थोडा फिसल भी रहा हु ...
और थोडा थोडा फिसल भी रहा हु ...
अच्छा लगता है वेसे तो.
यु बहेकना, फिसलना , और फिर संभलना
फिर संभल के चलना ...
फिर संभल के चलना ...
देख अब भी में संभालता हु ...
चल फिर अब में चलता हु ...
अब इस खंडर से में बहार निकलता हु ....
आकाशी तेज तले मेरी परियो से बात चले ...
में कितना निक्कमा हु ...
और फिर में आकाश के सामने देख कर कहेता हु !
हां में जानता हु तेरे गुस्से की वजे ...
में गुनाहगार हु तेरा , में अपराधी हु...!
मुझे तू कभी माफ़ ना करना ...
और में भी "अनंत"सजा के लिए तैयार हु ..!
"अनंत" मानी वो नहीं...
लेकिन ये "अनगिनत" अनंत...
लेकिन ये "अनगिनत" अनंत...
वो ये नहीं वो मै नहीं ...
जो में नहीं सो मै नहीं ...
अब हाल कुछ ऐसा ही होता हे ..
तो हम भी गाते हे ...
जिंदगी में जब तुम्हारे गम नहीं थे ...
अब हाल कुछ ऐसा ही होता हे ..
तो हम भी गाते हे ...
जिंदगी में जब तुम्हारे गम नहीं थे ...

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