धीरे
धीरे दिन ढल रहा था ..
मुझे रात
का इन्तजार था ...
आखिर रात
हुई ..
और में
निकल पड़ा महोल्ले की और जहा एक घर हे ....
अब वो घर
, घर नहीं
एक खंडर है...
जिस जिस
जगह प्यार नहीं होता वो हर जगह हर घर खंडर ही तो होता है....
वहा उस
महोल्ले से भी अनंत को प्यार करने वाली सारी की सारी लड़किया ....
एक के
बाद एक जाने लगी ...
सब अपना
घर बसाने लगी...
और फिर
उस महोल्ले में रहे गया एक अकेला अनंत ....
और वो घर
बन गया खंडर ...
वैसे
अनंत अकेला तो नहीं था ...
में और
अज्ञानी उनके साथ ही थे
उनके
बिलकुल करी बिलकुल पास ही थे ...
लेकिन
फिरभी अनंत बहोत अरसे तक ,
अपने आप
को अकेला ही महेसुस करता रहा ....
होता हे , प्यार
में अकसर ऐसा होता हे ...
जब कोई
चाहने वाला दूर चला जाता है ,
आदमी भीड़
में भी खुदको अकेला पाता है ...
ऐसा नहीं
की अज्ञानी ने कभी किसीसे महोब्बत नहीं की थी !
अज्ञानी
कोई संत साधू या फ़क़ीर नहीं था ...
लवो भी
जवा था एक आम युवा था ...
महोब्बत
उसने भी कभी की थी किसीसे ...
लेकिन
उनसे मिलाना लकीर में नहीं था ...
तो वो
खामोश हो गया ...
फिर अज्ञानी
ने मन ही मन कुछ तै कर लीया ...
लेकिन
कभी किसीको कुछ कहा बताया नहीं की
आखिर
उसने क्या तै किया है....
फिर वो
अपने आपमें गम रहेने लगा ...
वो अनंत
कीतरहा हर जगा गाता फिरता नहीं था ...
ना ही वो
अपनी महोब्बत की बाते कभी दोहराता था...
जो तकलीफ
थी वो सारी की सारी अनंत की थी ...
मेरा क्या
था मेरा तो कुछ भी नहीं था
सिर्फ उन
दोनों के सिवा ...
ख़ैर ....
बात उस
रात भी अनंत की ही चल रही थी आज भी वही दोहराता हु ...
कुछ साल
ऐसे गुजरे जब अनंत बड़ा ही टूट फुट चुका था
फिर कुछ
सालो बाद अनंत कुछ ठीक होने लगा ...
लेकिन
ऊपर ऊपर से ही .
भीतर तो
खुदको अकेला ही महेसुस करता रहा सालो तक ...
फिर जब
पूरा महोल्ला खाली खाली हो गया ...
और हम
तीनो रहे गए एक दूसरेका सहारा बनके ...
आखिर
जीने के लिए हर किसी को कोइना कोई सहारा तो चाहिए ही ...
अकेला
कोई कब तलक जी शकता है ...
हर
किसीको कभी तो प्यारे सहारे-ओ-साथी की तलब लगती ही हे..
अकेला
आदमी जिन्दा तो रहेता हे लेकिन उसमे जान नहीं होती ...
हर काम
करता हे अपनी सारी फर्ज निभाता हे लेकिन
भीतर से
बेजान सा रहेता हे वो शख्स ...
जो कभी
किसीके प्यारमे डूबा होता हे ...
और फिर
उन्ही के हाथो टुटा होता है...
स्थूल या
शुक्ष्म इन्सान को-
कोइना कोई सहारा तो चाहिए होता हे जीने के लिए
...
हां
सहारा ...
कोई बहार
ढूंढता हे कोई भीतर...
कोई
स्थूल कोई शुक्ष्म ...
जब सब
अकेले हो चले तब हम सब साथ हो गए ...
फिर हम
तीनो हर रोज देर रात के बाद मिलने लगे...
में हर
रात वहा चाय लेकर जाता
फिर हम
तीनो चाय पीते पीते कभी अपनी
तो कभी
इधर उधर की बाते करने लगे ...
ये सिल
सिला बहोत सालो तक चलता रहा ...
तब तक जब
तक हम तीनो साथ रहे ...
उसके बाद
एक दिन अचानक वो दोनों रात के अँधेरे में कही गुम हो गए ...
पता ना चला
मुझे कभी भी ये की उन्हें
जमी खा गई
या आशमा निगल गया ...
वो हमसे बहोत
बहोत बहोत ही दूर निकल गया....
इस जहा
से दूर.. बहोत दूर... निकल गए वो दोनों ....
फिर कभी
मिले ही नहीं ...
और फिर
में अकेला हो गया...
बहोत साल
बहोत रोया में उन दोनों की याद में ...
बाद में
मेने खुदका अकेला पन दूर करने का झरिया खोज निकाला ...
मेरे पास
उनकी उन दिनोकी बहोत सी बाते बहोत सारी यादे थी ...
में उनको
दोहराने लगा ...
उनके दोनों
के लिखे उनके ही अस्थि पिंजर जेसे कागजो को लेकर ...
में पढने
लगा उस अस्त व्यस्त कागजो में लिखी बातो को
में ठीक
ठाक करने लगा ...
यु मेरा
वक्त गुजरने लगा ....
यहाँ इस
खंडर में ...
मुझे
अच्छा लगने लगा
में उन
दोनों को ,
हर पल
मेरे साथ मेरे पास ही महेसुस करने लगा ...
और यु मेरा
अकेला पन और वक्त दोनों कटने लगा ....
बर्षो
पहले में बड़ी बे सबरी से रात का इन्तजार करता था ....
धीरे
धीरे दिन ढल रहा था ..
मुझे रात
का इन्तजार था ...
आखिर रात
हुई ..
और में
निकल पड़ा महोल्ले की और...
हमेशा की
तरहा दरवाजा आधा खुल्ला था ...
बिना
पूरा दरवाजा खोले में अपने शरीर को समेटते हुवे भीतर गया ....
वो दोनों
अपनी अपनी कुर्शी पर बेठे थे खाली पड़ी थी मेरी जगा ....
अंदर
जाके टिपोय पर चाय रखके में सीधा अपनी जगा पर बेठ गया ...
अज्ञानी
ने टिपोय पर पड़ी हुई कांचकी तीनो पियाली सीधी की ...
और अनंत
ने उसमे चाय भरदी ....
अपनी
अपनी पियाली उठा के जैसे शराब हो ...
हमने
आमने सामने पियालिया टकराते हुवे चियर्स किया ...
और फिर
चाय की चुस्की लगाते लगाते रातो में बातोका दौर शुरू हुवा ...
मेने
अनंत से पूछा की यार मुझे ये बता ...
वो भोला
बोला क्या...?
मेने कहा
अनंत जब इस जहा में सब अपनी अपनी जगह खुश होते है ...
फिर
क्यों इधर उधर भटक ते है ...
फिर
क्यों कोई आ आके किसीको परेशान करता है...
आखिर कोई
क्या ढूंढता है दूसरी जगा ...
तब जाके
अनंत बोला
परिया ये
माजरा कुछ ऐसा हे जेसे की ..
अनंत एक
शेर के साथ बोला ...
तू भी खुश
में भी खुश ...
फिर
"अनंत "ये कैसी भूख ....
जब अपना
कोई साथ हे पास है ..
फिर
क्यों नहीं मिलाता सुख ...
ये सवाल
सिर्फ तेरा ही नहीं परिया ...
और फिर
उसने वही पुराना शेर दोहरा ते हुवे कहा ,
उम्र भर
नहीं मिटती "अनंत" ये दो भूख ...
इक
प्रेमी की इच्छा और दूजे प्रेमिसे हूंफ ..!
फिर अनंत
चुप !
और ...
अपनी
दाढ़ी पर उंगली घुमाते हुवे मेरे सामने देख के अज्ञानी बोला ....
परिया
कुछ समजा क्या ?
जवाब मिल गया ना .! ?
मेने कहा,
हां समजा कुछ कुछ समजा ... !
अज्ञानी व्यंग
करते हुवे बोला
हां हां
वैसे भी तू पूरा कब समजता है ...
तुजे तो
हमेशा हम दोनों को ही समजाना पड़ता हे ...
मेने
कुबूल करते हुवे कहा , हां यार सो तो हे ...
मुझे सब
आधा अधुरा ही समजमे आता हे ...
और पूरा
तो जैसे तू बोलना शिखा ही नहीं ...
अज्ञानी
ने फिर मुझे टोका ...
मेने
कहा, हां सो तो हे...
पूरा तो
कभी तू कभी अनंत समजाता है...
चल अब
अनंतने क्या कहा ये भी पूरा समजा ...
अज्ञानी बोला
फिर ठीक हे, तो सुन परिया ...
अनंत ने
जो अंत में कहा उन पर जरा गोर फरमा ....
अनंत ने
अंत में दो मतलब की बात की है ...
मेने कहा
में कुछ समजा नहीं तू जरा खुलके बता ....
फिर
अज्ञानी ने अनंत के शेर की दूसरी लाइन-
दोहराते हुवे मुझे अर्थ समजाया ...
इक
प्रेमी की इच्छा और दूजे प्रेमिसे हूंफ ..!
परिया
अनंत ने इस शेर में बड़ी ही खूबी से ये कहे दीया हे की ...
सब को इस
जहा में ओरत हो या मर्द को .....
इस जहा
में एक दूसरा रिश्ता भी चाहिए होता हे....
मेने चाय
का घूंट भरते हुवे कहा यार अभी में-
पहेली बात भी ठीक तरहा से समज नहीं पाया ...
और तूने
मुझे दूसरी बात में उलजाया...
अज्ञानी
ने चाय का घूंट लगाया और अनंत को कहा ...
भई तूने
लिखा हे अब तुही सच मुच सब कुछ समजा शकता हे ...
इस बे
वकुफ़ कम अक्कल परिया को ..
चल अनंत अब
आगे तू क्या कहेना चाहता हे तू खुद ही इसे समजादे !
दिलके
दरिया को अपने परिया को ..
जोरसे
चायकी चुस्की भरके एक ही घूंट में –
पियाली
खाली करके अनंत बोला,
तो सुन
परिया ..
मेने कहा
, हां सुना
अनंत ...
परिया
कोई विवाद ना हो इसलिए कुछ अपवाद बाद करते हुवे कहू तो ,
अंदर
बहार अलग अलग जीवन हर कोई जीता है...
हर कोई
जीवनमे दुसरे से प्रेम –ओ- हूंफ चाहता है...
लेकिन , प्रेम-ओ-हूंफ शिर्फ़ जिस्म से जिस्म मिलने से ही !
मिलती है ऐसा हरगीझ नहीं है ...
और हां मैने
बर्षो पहेले भी ये बात कही थी की ,,,
प्रेम और
हूंफ दो प्रकार की होती है ...
"एक
जिस्मानी दूजी रूहानी "
जिस्मानी
प्रेम करने के लिए किसी और जिस्म का पास होना जरुरी होता है ...
और ये एक
स्त्री पुरुष के बिच की बात ही है...
लेकिन
रूहानी प्रेम और हूंफ पाने के लिए जिश्म की जरुरत ही नहीं रहेती ...
रूहानी
प्रेम किसी से भी दूर रहे कर भी हो शकता है ...
और फिर
दूर दूर रहेते हुवे भी हम बहोत अच्छा महेसुस कर शकते हे ...
सायद पास
पास होती हुवे भी !
जो
अहेसास हम अपने पास पास ही अपने साथ साथ ही
रहेने
वाले साथी से महेसुस नहीं कर शकते वो अहेसास....
हम अपने
किसी चाहने वाले साथी से दूर दूर रहेकर भी पा शकते हे ...
और वो एक
अलौकिक अहेसास होता है ...
इस
अहेसास को और बहेतारिन बनाता हे किसीका हमारे लिए सोचना...
हां परिया
...
जब कोई
दूर रहेकर भी हमारे लिए सोचता हे तो हमें भी दूर रहेते हुवे भी !
उसका
अहेसास होता हे ...
जब दूर
रहेकर कोई हमारे लिए कुछ लिखे कोई गीत गाये तब भी हमें
उसके
बिलकुल करीब होने का अहेसास होता है...
और फिर
ये कोई कम सुख तो नहीं की कोई दूर रहेकर भी ...
हमारे
बारे में सोचे हमको समजे हमें चाहे ...
इस जनम
में इतना काफी नहीं क्या परिया ... ?
अनंत की
बाते सुनकर में गहेरी सोच में डूब गया ...
तब
अज्ञानी बोला सोचता क्या है परिया...
अनंत ठीक
हो तो कहे रहा है !
अब तुजे
समजना है .!
अब तुजे
समजना होगा ..!
अब तुजे
भी ! ये समजना होगा !
हां परिया
तुजे भी ये सब समजना होगा ...
काया की
माया छोड़ परिया काया की माया छोड़...
रूह से
नाता जोड़ परिया रूह से नाता जोड़ ...
और हमारे
साथ,
हमारी सोच के साथ,
हमारी खोज के साथ
और,
हमारी
मौज के साथ चल !
तुजे भी ऐसा
बड़ा सुख-ओ-सुकून मिलेगा.
जैसा
हमको मील रहा हे !
और तू
हमारे साथ हो जाएगा तो,
हमें भी ख़ुशी –ओ –चेन मिलेगा..
अज्ञानी
की बात सुनके
में
गहेरी सोच से बहार निकला..
और फिर...
अपनी औकात
पे आ गया ...
मेने कहा
...
भई
तुम्हारी सोच अलग है,
तुम्हारी
खोज अलग हे,
तुम्हारी
मौज अलग हे.
तुम दोनों
जो भी कहो...
सायद यही
सही हो,
लेकिन....
मेरी सोच,
मेरी खोज,
और...
मेरी मौज !
अलग है !
मेरी सोच,
मेरी खोज,
और...
मेरी मौज !
अलग है !
मुझे तो
जबतक जैसा में चाहता हु ऐसा
जिश्मानी
– ओ – रूहानी सुख नहीं मिलाता तबतक
में आप
दोनों की यात्रा में साथ नहीं चल शकता...
मैने ऐसा
तै किया है ...
हां मैने
ऐसा ही तै किया है...!
मेने जब
अपना फेसला सुनाया तब जाके
अनंत
मुजपे गुस्साया ...
और मुजप
पर गुस्सा हो कर अनंत बोला,
फिर तो भटकता
ही रहे तू उम्र भर...
अनंत काल तक अज्ञानी की तरहा...
तेरा कुछ नहीं हो शकता..!
परिया तेरा
कुछ भी ! नहीं हो शकता ...!
अनंत का
गुस्सा देख अज्ञानी ने अनंत के हाथमें-
पानीका गिलास थमाते हुवे कहा....
छोड़ अनंत
ये नहीं समजेगा...
ये कभी भी नहीं सुधरेगा ...
ये कभी भी नहीं सुधरेगा ...
जो समजना सुधारना ही नहीं चाहता
वो कभी सुधरेगा समजेगा नहीं ...
वो कभी सुधरेगा समजेगा नहीं ...
एक येही
नहीं अनंत दुनिया का कोई भी इन्सान ...
जब तक
खुद अपने भीतर से कुछ समजना नहीं चाहता ...
कोई बिगाड़ा हुवा इन्सान जबतक खुद सुधारना नहीं चाहता ...
कोई बिगाड़ा हुवा इन्सान जबतक खुद सुधारना नहीं चाहता ...
तब तक
उसे दुनिया भर के संत-ओ ग्रंथ यहाँ तक की
इश्वर या खुदा खुद आके समजाये ,
तब भी ऐसे लोग कुछ भी नहीं समजते.
तब भी ऐसे लोग कुछ भी नहीं समजते.
और ये
उनका हिसाब होता है ..!
हां अनंत
यही उसका हिसाब होता है...
ऐसे लोगो
को अपने हाल पर ही छोड़ देना चाहिए ...
ऐसे मुर्ख लोगो को अपने हाल पे ही छोड़ देना अच्छा है...
ऐसे मुर्ख लोगो को अपने हाल पे ही छोड़ देना अच्छा है...
परिया को
भी अपने हाल पर छोड़ दे ...
सायद कोई
बड़ी ठोकर ही उसे सुधार दे...
मेरी आंखे भीग गई , में थोडा गभरा गया...
मेरी आंखे भीग गई , में थोडा गभरा गया...
और फिर
मुझे उन दोनों पे गुस्सा भी आया ...
जब वो
दोनों मुजपे गुस्सा कर शकते हे तो में क्यों नहीं !
मेने भी
उनपे गुस्सा करके कहे दिया ...
बहोत हो
चूका कबसे तुम दोनों बोले जा रहे हो ...
में चुप
चाप सुन रहा हु ...
तो तुम
मुझे डांट रहे हो ...
रहेने दो
अब मुझे कुछ सुनना समजना नहीं है...
अब में
बोलूँगा तुम दोनों रहेना चुप !
अगर मेरा
ये हिसाब हे तो यही सही ...
में
सिसाब चुकता करुंगा ...
और भुगता
रहूँगा ...
अपने
हिस्से और हिसाब के मुताबिक़ सुख और दू:ख ..!
में
गुस्से के मारे अपनी कुर्शी से खड़ा हो के चलने लगा ...
मुझे ऐसे
भागते हुवे देख पहेले अज्ञानी फिर अनंत मुजपे हसने लगा ...
में
दरवाजे की और चला ...
वो दोनों
मेरे पीछे पीछे मुझे दरवाजे तक छोड़ने आये ...
या कुछ
बोलने आये ...
कुछ पता
नहीं जाते जाते मेने सिर्फ इतना सुना
अनंत
बोला
आज नहीं
तो कल ...
अज्ञानी
बोला
ठिकाने आ
जायेगी तेरी अक्कल ...
फिर निकल
जायेगी तेरी ये सारी अकड़ ...
इतना
कहेके वो दोनों भीतर चले गए और में ...
आँखे लिए बोजल ..
आँखे लिए बोजल ..
अंधेरो
में ओजल ...
हो गया...
हो गया...
और ये गीत खंडर के अंदर गूंजने लगा ....








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