मने कोईज फर्क नथी पडतो !
हां ! मने पण हवेथी कशोज फर्क नै पडे,जा !
हू जाऊ छु !
फरी क्यारेय तने नै मलु ,
आजथी तारी मारी कीट्टा !
हां...आ.. आ.. अ...,
अछ्छा...
एतो देखाय ज छे !
के तने कोईज फर्ख नथी पडतो !
आ तारी आंसुथी तगतगती आंखो !
गले डुमो बाझेलो स्वर...
रडु रडु थता कपकपाता गुलाबी गुलाबी होठ !
अने गुस्साथी झणझणतु,
आ तारु आखे आखु बदन..!
अने ,तोय तु जुठु बोले छे तद्दन.!!!
बौ केवाय !
अने तु कहे छे के,,,
मने कोईज फर्क नथी पडतो...!
कोई पण वात ना संदर्भे ज्यारे...
आ वाक्य ! कोई उच्चारे छे के,,,
मने कोईज फर्क नथी पडतो ...!
त्यारे ...!
खरेखर तो बौ मोटो फर्क पडी चुक्यो होय छे..!
वर्शो पहेला...
आ वात,अनंते, वाते वाते आ शब्द प्रयोग करती,
एनी चहीतीने कही'ती...!
वर्शो पहेला....
"अनंत"....
वात मात्र आटली ज होत तो वात जुदी हती !
पण वात मात्र आटलीज नहोती !
वात कै जुदीज हती !
तसवीर मेच नथी !
ए पण खरुज !
पण हाल हु मजबुर छु !

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