ऊतार्या पछी पण ऊतरे नै ,
एवा आ गंजीनी ब्रा,ड वीषे पुछवु नै ...
!
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आवु गंजी शोधवा ,
फांफा पण , नै मारता.
क्यांय नै मळे ,खोटा हेरान थशो ....
केमके प्राक्रुतीक छे ने ! अकले कौ छु ..!
एवा आ गंजीनी ब्रा,ड वीषे पुछवु नै ...
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आवु गंजी शोधवा ,
फांफा पण , नै मारता.
क्यांय नै मळे ,खोटा हेरान थशो ....
केमके प्राक्रुतीक छे ने ! अकले कौ छु ..!
अने पछी ,,,
मने वर्षो पहेलानी भाईबंघ अनंतना जीवननी ...
एक आख्खी धटना रचना समेत याद आई गई....
आग तडका ने परसेवा नी छाप !
अथॉत ...
आग तडका ने परसेवा ए उपसावी छोडेली छाप !
आ वात जोके मारी नथी ...!
हां वासो मारो छे ए वात नोखी छे ..!
वर्षो पहेलानी एक धटना ...
अनंक कहेतो के ,
सवार थी रात सुधी ,
हु आग सहु छु !
राख फाकु छु !
तडके तपु छु !
परसेवे नीतरु छु ...!
ए हकीकत छे ...!
जोके मारे मारी महेनतनो,
पुरावो कोईने आपवानी जरुर नथी ..!
अगर तने या जेने पण भरोसो ना होय,
ए,मारो वांसो जोईले ,
आग,राख,तडका,अने परसेवाए,
दीवसे के राते सतत मारी साथे होवानी ,
छाप छोडी छे ! मारा वांसा पर !
अने पछी , चहिती सवाल करे छे
आखो दीवस भीतर भराईने तु करे छे शु अनंत ?
अनंते कह्यु ,सख्खत महेनत,
काळी मजुरी घोळी कमाणी ...!
खोटु बोलमा अनंत ...!
तारु मो जोईने कोई माने नै के तु ,,,
खैर ...
ईश्वर शाक्षी छे...!
मारे कोईने कहेवा मनाववानी जरुर नथी ...!
"अनंत"
आ बघु ,आवु बघु ,पहेला कह्यु ए,
बघु बघु ने बघूज..!
वर्षो पहेला ....
अनंते पेली एनी कोई चहीता ना
सवालना जवाबमा कहेलु ....


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