आज कई बर्षो के ये गीत मेरे कनोसे टकराया .
तो....
उदास चहेरा और आंखोमे नमी लिए
उसी महोल्लेके अंदर एक कोने में बैठा
"अनंत" फिर मुझे याद आ गया....
अपने जीवनमे संघर्ष करता हुवा वो जब कभी तंग आ जाता था,
और वो जब कभी प्यारमें धोखा खाता था तब वो अक्सर,
अपने दिलको समजाने , मनको बहेलाने और खुदका होसला बढ़ाने को
अपने आपको , ऐसे नगमे गाता और सुनाता था ....
ये शेर बार बार दोहराना उसकी किस्मतमे लिख था ,
और बस वो जब कभी दिलको चोट पहोचती ...
तो बस,,,,
(""तेरे प्यार की माला कही जो टूट भी जाये
जन्मो का साथी कभी जो छूट भी जाये
दे देकर झूठी आस तू खुद को छलते जाना रे...."")
उसी राह पे राही चलते जाना रे....
जो राह चुनी तुने, उसी राह पे राही चलते जाना रे....
हो कितनी भी लम्बी रात, दिया बन जलते जाना रे.....
कभी पेड़ का साया पेड़ के काम न आया
सेवा मे सभी की उसने जनम बिताया
कोई कितने भी फल तोड़े, उसे तो है फलते जाना रे....
उसी राह पे राही चलते जाना रे....
जीवन के सफ़र मे ऐसे भी मोड़ है आते
जहां चल देते है अपने भी तोड़ के नाते
कही धीरज छूट न जाये, तू देख संभालते जाना रे....
उसी राह पे राही चलते जाना रे....
(""तेरे प्यार की माला कही जो टूट भी जाये
जन्मो का साथी कभी जो छूट भी जाये
दे देकर झूठी आस तू खुद को छलते जाना रे...."")
उसी राह पे राही चलते जाना रे....
तेरी अपनी कहानी यह दर्पण बोल रहा है
भीगी आंख का पानी, हकीकत खोल रहा है
जिस रंग मे ढाले वक़्त, मुसाफिर ढलते जाना रे
उसी राह पे राही चलते जाना रे.....
"कोई कितने ही फल तोड़े उसे तो हें फलते जाना...रे.... "
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