सूरज की गर्मी धरती निगल रही थी, धीरे-धीरे रात भी ढल रही थी... बारिश का मौसम था, मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू हवा के साथ चल रही थी... मेरी इच्छा खंडर पर जाने को मचल रही थी...
और आखिर.... देर रात के बाद मेरा चाय लेकर महोल्ले में जाने का वक्त हुआ, और मैं निकल पड़ा चाय लेकर महोल्ले की ओर... बारिश के मौसम में गीली सड़क पर चलने का बड़ा मज़ा आता है... वो पुरानी गली, वो बरसों पुराना महोल्ला और कुछ अजीब सी पुरानी खुशबू... हम तीनों को बेहद पसंद थी...!
बारिश के मौसम में, कभी-कभी हम तीन यार देर रात के बाद, ऐसी कुछ पुरानी गलियों में घूमने निकल पड़ते थे... जिस गली में बहुत से पुराने घर हुआ करते थे। बस इसे देखते-देखते, कुछ अजीब सा अहसास करते-करते हम तीन यार... अपनी मस्ती में इधर-उधर की नई-पुरानी बातें किया करते थे... खैर, छोड़ो उन बातों को! अब तो वो रातें, वो बातें सारी, सिर्फ यादें बनके रह गई हैं...
हां, तो मैं चाय लेकर चला महोल्ले की ओर... चारों ओर घना अंधेरा था और मैं अकेला था... दूर-दूर कहीं कुत्ते के भोंकने की आवाज और किसी घर में छोटे बच्चे के रोने की आवाज भी, अंधेरी रात को रौनक बख्शती थी...! चलते-चलते भीगे-भीगे मौसम का लुत्फ उठाते-उठाते आखिर मैं महोल्ले तक पहुंच गया... पतली गली से गुजरकर मैं महोल्ले के भीतर गया. हमारे उस खंडर का दरवाजा हमेशा की तरह आधा खुला था... भीतर एक मोमबत्ती का उजाला... और मसाला बत्ती की खुशबू से हमारा खंडर अंदर से भरा-भरा था... कुछ पल दरवाजे के पास खड़ा रहकर मैंने गहरी सांस ली... और अगरबत्ती के साथ बारिश की भीनी-भीनी खुशबू को मैंने अपने भीतर भर लिया... और फिर... मैं अपने जिस्म को समेटकर भीतर गया.
अनंत और अज्ञानी मेरा और चाय का इंतजार किए बैठे थे, अपनी-अपनी कुर्सी संभाले हुए... तीन पुरानी कुर्सी और बीच में ऐसी ही पुरानी टिपोय... टिपोय के ऊपर एक पानी का लोटा और तीन कांच की पियाली... रात होते ही अपनी-अपनी जगह संभाल लेती थी... और हम तीनों—मैं, अनंत और अज्ञानी—फिर अपनी-अपनी जगह संभाल लेते थे.
अनंत और अज्ञानी अपनी-अपनी कुर्सी संभाले हुए बैठे थे... मैं भीतर गया और दोनों एक साथ बोल उठे: "आ गया परिया...!"
मैंने भीतर जाकर अपनी कुर्सी संभालते हुए कहा: "हां यार... मैं आ गया... आ ही गया...!"
अज्ञानी बोला: "चल यार, अब जल्दी से गरमा-गरम चाय की पियाली भर...!"
और फिर अनंत बोला... तो मेरा हाथ थम गया... अनंत बोलने लगा, दिल खोलने लगा:
"बारिश के मौसम में गरमा-गरम चाय पीना बड़ा अच्छा लगता है... हाथ में जब गरमा-गरम पियाली पकड़ते हैं तो ऐसा लगता है जैसे, प्रियतमा की पतली कमर पकड़ी हो... और फिर गरमा-गरम चाय का घूंट... जैसे ठंड में प्रियतमा की बाहों की गरमा-गरम हूंफ... पियाली होठों से लगती है तो ऐसा महसूस होता है जैसे प्रियतमा के होठों से होठ मिले हों... और कसके चूमते हो... बारिश के मौसम में...!"
मैं और अज्ञानी उछल पड़े और एक साथ बोल उठे: "वाह वाह... वाह वाह! क्या बात है अनंत, तूने तो चाय पीने से पहले... चाय पे चंद शेर क्या सुना दिए, ऐसा लगा जैसे चाय पे चार चांद लगा दिए...!"
मैंने अज्ञानी के सामने देखते हुए कहा: "यार... अनंत पे बारिश छा गई है...!"
अज्ञानी बोला: "हां यार, हवा में मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू जो आ रही है...!"
अनंत बोला: "चल भई चल परिया, अब चाय की पियाली भर... बातों-बातों में चाय ठंडी हो जायेगी... बातें तो होती रहेंगी रात भर...!"
मैंने चाय की तीनों पियाली भर दीं... अपनी-अपनी पियाली उठाकर हमने 'चीयर्स' किया और चुस्की भरनी शुरू कर दी... चाय की चुस्की भरकर मैंने अनंत और अज्ञानी के सामने देखते हुए कहा: "चलो यार, आज हम विचार पर कुछ विचार करते हैं..."
अज्ञानी ने सीधे कह दिया: "यार, बड़ा अच्छा विषय है परिया... अब तो लोग विचार के व्यापार करते हैं...!"
मैंने कहा: "यार, मैं कुछ समझा नहीं..."
"हां वैसे भी तू कब समझता है...!"
"अरे यार, तो समझा ना...!"
"हां, समझाना तो पड़ेगा तुझे... तब ही तो कुछ समझ में आएगा मुझे...!"
"अरे यार, तू फिर ऐसी बात बोला जो ऊपर से जाए, पर मेरी समझ में ना आए...!"
मेरे और अज्ञानी के बीच बातें शुरू हो गईं... हमारी बात चल रही थी, उस दौरान अनंत अपना वही पुराना दीवार पे लटकता पेड़—जिसमें कुछ पुराने कागज़ हमेशा लगे रहते हैं, जिसमें अनंत और अज्ञानी दिन भर कुछ ना कुछ लिखते रहते हैं—वो पेड़ उतार कर अनंत कुछ लिखने लगा.
मेरी और अज्ञानी की बात आगे बढ़ी... मैंने अज्ञानी से कहा: "तूने जो दो बातें कहीं वो मेरी समझ में आईं नहीं... अब जरा विस्तार से समझा. पहले तूने कहा 'अब तो लोग विचार के व्यापार करते हैं...' और फिर तूने कहा 'हां समझाना तो पड़ेगा तुझे... तब ही तो कुछ समझ में आएगा मुझे...'"
अज्ञानी ने कहा: "सीधी सी बात है... विचार में बड़ी ताकत होती है, ये बात पहले कुछ चंद लोग ही जानते थे... लेकिन वो किसी को बताते नहीं थे... फिर कुछ और लोग भी पुराने ग्रंथ पढ़-पढ़ के ये बात जान गए... फिर उन्होंने सोचा चलो हम ये बात दुनिया को बताते हैं, समझाते हैं... इसका हमें पैसा भी मिल सकता है... फिर उन्होंने धीरे-धीरे इस विचार को आगे बढ़ाया... पुराने ग्रंथों में से चुरा-चुरा के अपने तरीके से नया पुस्तक बनाया... और थोड़ा-बहुत समझाके लोगों के हाथ में अपना पुस्तक थमा दिया... और ढेर सारा रुपया भी कमा लिया... हुआ ना विचारों का व्यापार...!"
मैंने कहा: "हां यार... फिर दूसरी बात का क्या मतलब...?"
"वो भी आसान सी बात है... तुझे ये भ्रम है कि मैं बहुत कुछ जानता-समझता हूं... लेकिन हकीकत ये है परिया कि वैसे मैं कुछ भी जानता नहीं... लेकिन जब कभी तू कुछ सवाल करता है, तब ना जाने कैसे अचानक... तेरे सवालों के कुछ जवाब मुझे मिल जाते हैं, और मैं तुझे समझाने लगता हूं... और ऐसे तुझे समझाते-समझाते, मैं कुछ-कुछ, बहुत ही थोड़ा कुछ समझने लगता हूं...! लो, अब हो गई तसल्ली...?"
"हां, थोड़ी-थोड़ी..."
"काफी है परिया... ज्यादा समझ कर भी क्या करना है... जितना कम जानो उतना जीने का मज़ा है... खैर...!"
मैंने कहा: "ऐसा ही सही...!"
फिर मैंने अनंत की ओर ध्यान लगाया... वो कुछ लिख रहा था. मैंने अनंत से पूछा: "क्या लिख रहा है अनंत..? जरा हमें भी बता, या फिर सुना...!"
अनंत लिखने में इतना डूबा था कि मैं बोला, वो भी उसने सुना नहीं. फिर मैंने अनंत को कंधे से हिलाकर कहा: "यार, तुझे कहता हूं सुनता नहीं क्या...?"
लिखते-लिखते ही अनंत बोला: "हं, हं, हां हां..." ऐसे 'हूहू-हाहा' करके फिर अपनी लिखावट पूरी करने में खो गया.
लिखावट पूरी हो जाने के बाद ही, अनंत मेरे सामने देखकर बोला: "अब बोल, तू क्या कहता था परिया...?"
"अरे भाई, मैं कुछ कहता नहीं था, मैं तो तुझे पूछता था..! कि तूने क्या लिखा...?"
"हां, वो तो मैं बताऊंगा लेकिन बाद में. पहले जब मैं लिख रहा था, उस दौरान तुम दोनों के बीच क्या बातें हुईं ये तो बताओ...!"
अब अज्ञानी मौन हो चुका था... मैंने कहा: "हमारी बात विचार पर चल रही थी अनंत... हम विचार पर विचार-विमर्श कर रहे थे... विचार यानी सोच, यानी ख्याल..."
अनंत ने विचार के दूसरे मतलब बताए... मैंने कहा: "हां वही... सोच, विचार, ख्याल जो भी कहो... आखिर में सारे एक ही मोड़ पर आके खड़े रहते हैं. है ना अनंत...?"
"हां, शायद ऐसा ही कुछ है परिया.... लेकिन फिर भी ऐसा नहीं... सोच अलग, विचार अलग और ख्याल भी अलग... वैसे ख्याल को विचार भी कहते हैं, और ख्याल का दूसरा मतलब 'ध्यान' भी है. जैसे कोई मां अपने बड़े बेटे या बेटी को कहती है—जाओ बाहर जाके खेलो.. लेकिन छोटे बच्चे का 'ख्याल' रखना यानी 'ध्यान' रखना, कहीं उसे चोट ना आए... ऐसे ख्याल विचार से अलग हुआ. और फिर सोचना मतलब, अब सोचना उन बच्चों को है कि उस नन्हे का ख्याल कैसे रखना है... ऐसे सोच और विचार भी अलग हुए... समझा कुछ...?"
मैंने कुछ ना समझते हुए भी कहा: "हां, थोड़ा-बहुत..."
अनंत ने कहा: "काफी है... और ना ही समझे तो और भी बेहतर...!"
मैंने कहा: "वो कैसे? अब ये भी समझा..."
मेरी उस बात को टालते हुए अनंत ने कहा: "परिया, आदमी एक पल के लिए भी...! खाली बैठता नहीं और चाहे भी तो बैठ सकता नहीं... विचार जो हैं ना परिया, वो अक्सर सतत आते-जाते रहते हैं... कभी ये, कभी वो, कभी इसका, कभी उसका, तो कभी खुदका..."
अनंत बोल रहा था, मैं सुन रहा था... वैसे मौन आंखें मींचे अज्ञानी भी सुन रहा था... मैंने फिर अनंत की बातों पर ध्यान लगाया... मैंने अनंत से पूछा: "अनंत, क्या विचारों को रोका नहीं जा सकता...?"
"बड़ा ही मुश्किल है परिया, विचारों को रोकना... और अब आता है सोचना, हम सोचते कम हैं... और सोचने का ख्याल भी हमें कम आता है... विचार आते-जाते रहते हैं, लेकिन कहां से आते हैं, क्यों आते हैं... कहां जाते हैं, कैसे जाते हैं... ये कोई नहीं जान सकता... क्योंकि कोई सोचता ही नहीं..! कभी-कभी तो ऐसा होता है परिया कि, जिसे कभी हमने देखा ना हो, जिसके बारे में हमने कभी सोचा भी ना हो, ऐसी व्यक्ति के विचार भी..! हमारे दिमाग में कभी-कभी आ जाते हैं... फिर उनका विचार हमारे ज़ेहन में क्यों आया? जिनको हमने कभी देखा तक नहीं, जिसे हम जानते तक नहीं... इस बारे में हम कभी सोचते ही नहीं... अगर सोचें तो सोचने से पता चलता है कि, उनसे हमारा कोई ना कोई रिश्ता तो ज़रूर है... रिश्ता आज-कल का ही हो, ऐसा नहीं होता... कभी पल-दो पल का रिश्ता हम भूल जाते हैं, लेकिन वो रिश्ता, वो पल-दो पल का मिलना... हमारे भीतर गहराई से अपनी पकड़ जमा लेता है... कोई-कोई रिश्ता बहुत पुराना रिश्ता भी हो सकता है... बहुत ही पुराना मतलब युगों पुराना...!"
मैंने कहा: "तो क्या अनंत, विचार का आना कभी अटकता नहीं...?"
तब जाके अनंत बोला: "विचार का आना-जाना सांस थमने के बाद भी चलता रहता है... परिया, यूं तो विचार कभी अटकता नहीं, लेकिन कभी-कभी... किसी एक पे जाके अटक जाता है... फिर सारे विचारों से ध्यान भटक जाता है...!"
अनंत ने फिर उलझाने वाली कोई नई बात छेड़ी... मैंने कहा: "यार, तू मेरी गुत्थी सुलझाने के बजाय उलझाए जा रहा है..."
तो अनंत गुस्सा होके बोला: "चल फिर भाग यहां से! जा! घर जाके सो जा... ऐसी बात करता है जैसे मैं खुद सुलझा हुआ क्यों ना होऊं...!"
मैंने कहा: "इसमें इतना गुस्सा क्यों होता है...?"
अनंत ने कहा: "फिर! क्या करूं यार, मैं खुद भी उलझा हुआ हूं... तू सवाल करता है और मैं जो जी में आए, बिना सोचे-समझे जवाब देता हूं... मुझे खुद पता नहीं मैं तुझे क्या कहता हूं... कल को अगर फिर तू पूछेगा तो हो सकता है बात बदल जाए... या फिर मैंने तुझे क्या-क्या कहा था, मुझे याद ही ना आए...!"
मैंने कहा: "छोड़ ना यार, हमें कौन से मेडल लेने जाना है... ऐसी-वैसी बातें कर-कर के बस रात ही तो बितानी है...!"
अनंत बोला: "हां यार, ये तो ठीक है, ये बात तू बरोबर बोला...!"
मैंने कहा: "क्या यार तू अनंत भी ना, सच में बड़ा भुलक्कड़ है... अरे यार, ये बात भी मैंने तुझ ही से तो जानी है, सीखी है, समझी है...!"
अनंत बोला: "हां हवे... ये सब ऐसा-वैसा भी..! यहां याद किसको रहता है..!"
मैंने कहा: "चल फिर अब आगे चला..."
"हां, तो मैं क्या कह रहा था...?" अनंत ने मुझसे पूछा.
मैंने कहा: "तूने कहा विचार किसी एक पे अटक जाता है, ऐसा कुछ..."
"हां...आ...अ...अ...अ... याद आया... हां, तो विचार किसी एक पे तब अटकता है, जब हमारे दिल में... कोई खटकता है, या फिर हमारी आंखों में किसी का चेहरा बसता है... बस तब जाके विचार थमता है, एक उसी पर जो हमें, हमारी नज़र को, हमारी रूह को, हमारी आंखों को भा गया हो... फिर बस हम और हमारे विचार उसी में अटक जाते हैं... हमें सिर्फ उसी का ख्याल आता है... ऐसे जैसे अब मुझे नींद आती है, तो मुझे बस नींद ही आती है...!"
मैंने कहा: "वो सब तो ठीक है, नींद तो मुझे भी आती है... और अज्ञानी तो कब से सो गया है..."
उसका नाम लिया नहीं कि अज्ञानी आधी आंखें खोलकर, अपनी दाढ़ी में उंगली घुमाते हुए बोला: "यारो, मैं सोया नहीं, जाग गया हूं! सोए तो तुम हो, जो जागे नज़र आते हो... कब से सुन रहा हूं तुम्हारी बेमतलब की बकबक...!"
अनंत बोला: "मुझे पता है अज्ञानी.... ये सब तू परिया को बता..! मुझे नहीं...!"
मैंने कहा: "खैर.... अब छोड़ो भी यार... मेरा जी अनंत के उस कागज़ में अटका है, जिसमें उसने अभी-अभी कुछ लिखा है...!"
अज्ञानी गुस्सा हो के बोला: "लो, अब वो एक बाकी रह गया था...! इतनी बकबक की अभी-अभी, फिर भी थके नहीं तुम..! अभी तुम्हारा जी नहीं भरा...!"
अनंत ने कहा: "यार, मैं तो सोते-सोते नींद में ही बातें कर रहा था... इसलिए मुझे तो कोई थकान महसूस ही नहीं होती, बल्कि आराम... ही आराम है...!"
मैंने कहा: "फिर मेरी नींद का क्या... मुझे तो गहरी नींद आ रही है...!"
वो दोनों एक साथ बोले: "तो जा, जाके सो जा, किसने है तुझे रोका...!"
मैंने कहा: "हां हां, चला जाऊंगा... चला ही जाऊंगा... आखिर... लेकिन...!"
वो दोनों एक साथ बोले: "लेकिन क्या परिया...?"
मैंने कहा: "वो झरिया... और वो दरिया...!"
अनंत बोला: "कौन सा झरिया, परिया...?"
मैंने कहा: "वो जो मुझे तुम्हारे पास खींच लाता है..."
अज्ञानी अपनी दाढ़ी पर उंगली घुमाते हुए बोला: "ये लो, अब ये बाकी रह गया था पहेलियां बुझाने में, सो उसने भी शुरू कर दिया...!"
अनंत बोला: "यार परिया, साफ़-साफ़ बोल कौन सा झरिया, कौन सा दरिया...?"
मैंने कहा: "वो जो होकर भी नहीं है हमारे दरमिया..."
अनंत ने मुझे कहा: "क्या बोले जा रहा है तू परिया...! कौन होकर भी नहीं है हमारे दरमिया...?"
मैंने कहा: "यार, वो तो मुझे भी पता नहीं... लेकिन तूने अभी-अभी जो कुछ लिखा है, बस वो मुझे दिखा दे...! फिर मैं सो जाऊंगा..."
अनंत ने वो पेड़ मेरे हाथ में थमा दिया और कहा: "ये ले, पढ़ ले और फिर घर जाके सो जा...!"
फिर मैं ये अनंत की लिखी रचना पढ़ने लगा, जिसका शीर्षक था:
यूं ही तो कुछ भी होता नहीं...
यूं ही तो कुछ इस दिल के जहां में होता नहीं,
होता है क्यों मगर यूं? मुझे कुछ पता नहीं।
उसका चेहरा इस कदर उतर गया है दिल में,
कि अब दिमाग उसके सिवा कुछ सोचता नहीं।
आ गई होगी शायद उसे भी याद बिछड़े यार की,
वरना कहानी मेरी सुनके यूं ही तो कोई रोता नहीं।
कभी जो बरसों में नहीं होता, होता है कभी तो वो,
बस इक पल में सब बदलता है, दिल बदलता नहीं।
वो भी मेरे बारे में सोचती रहती है दिन-रात, मुझे भी तो—
है उनका ही ख्याल, अब सोच में हमारी कोई फासला नहीं।
अजीब! कुछ तो अजीब है..! उसके चेहरे में, उसकी बातों में,
वरना यूं ही ये दिल मेरा मुझे, कभी किसी के पास खींचता नहीं।
सब कुछ बदलता है, लोग बदलते हैं पल-पल, और पल-पल सच—
बदलता है दुनिया में, बस एक रात और दिन, कभी बदलता नहीं।
जानता नहीं मैं, जाने क्यों वो मेरे बारे में जानना चाहते हैं?
लोग बहुत कुछ..! जिनके बारे में तो मैं कुछ भी जानता नहीं!
बस कुछ वजह है ऐसी नई-पुरानी कि, मैं इकरार करता नहीं,
इनकार भी तो नहीं करता, ऐसा नहीं कि मैं उसे चाहता नहीं।
फिर मेरे दिल में भी..! जाग उठती है, उम्मीद दिल लगाने की,
ऐसे जैसे कि मैं, दिल लगाने की दर्दनाक सज़ा जानता नहीं।
फिर भी क्यों तेरा दिल किसी से फिर दिल लगाना चाहता है?
"अनंत" जब तू जानता है... कि, इश्क में जो डूबता है, वो मरता नहीं, और बचता नहीं।
*બ્લાસ્ટ*
"અનંત" કોઈ તો રિશ્તો હશે આપણા વચ્ચે..!
નવો ના સહી, જૂનો જ સહી..!
વરના દૂર-દૂર રહેતા હોવા છતાં..!
કોઈ એકબીજાના વિશે આટલું વિચારતું નથી..!
— "અનંત"
ઇતના પઢકે આખીરમાં મને ફરી અનંતનો એ શેર યાદ આવ્યો... એ અવારનવાર મને આ શેર સંભળાવતો હતો. અનંત મને કહેતો કે, "પરિયા..."
"ઉમ્ર ભર મિટતી નહીં 'અનંત' યે દો ભૂખ..!
એક પ્રેમી કી ઈચ્છા ઔર દૂજી પ્રેમી સે હુંફ...!"
"અનંત"
ઉનકી ઇજાઝત લેતે હુએ મેને કહા... ચલો યારો, હવે તમે પણ સોઈ જાઓ અને હું પણ...!
વર્ષો પહેલા અનંત અને અજ્ઞાની વચ્ચે થયેલી વાતચીત વાંચી ઓલી ચહીતી વાંચકે કહ્યું.
અરે વાહ પ્રિયે, વાહ! તેં આજે જે હિન્દી અને ગુજરાતીના મિશ્રણ સાથે ખંડેરની એ ભીની ભીની મધરાતનો માહોલ આલેખ્યો છે ને, એ વાંચીને તો જાણે હું પોતે જ એ ઘનઘોર અંધારી રાતે, કાદવ-કીચડવાળી સાંકડી ગલીઓમાંથી પસાર થઈને, એ અડધા ખુલ્લા દરવાજાવાળા ખંડેરમાં પહોંચી ગઈ હોઉં એવો અહેસાસ થાય છે!
ચાયની એ ગરમાગરમ પિયાલીને પ્રિયતમાની કમર અને એની ચુસ્કીને હોઠોના સ્પર્શ સાથે સરખાવતો અનંતનો એ અંદાજ ખરેખર રોમાંચક છે. અને અજ્ઞાનીએ જે વિચારોના વ્યાપારની વાત કરી, તથા તેં પૂછેલા સવાલોમાંથી જ એને કેમ જવાબો જડે છે એ જે રહસ્ય ખોલ્યું, એ જ્ઞાનની બહુ ઊંડી અવસ્થા છે.
પણ છેલ્લે તેં અનંતના એ લાકડાના પેડ મા ભરાવેલ કાગળમાંથી જે રચના વંચાવી"યુ હી તો કુછ ભી હોતા નહીં..."એ તો આખી વાર્તાનો જીવ છે પ્રિયે. છેલ્લે ઈશ્કમાં ડૂબવા વાળો મરતો પણ નથી અને બચતો પણ નથી, એ વાત સીધી રૂહ સુધી પહોંચી જાય છે.
અહા પ્રિયે! ખંડેરની એ મધરાતે, જોજન છેટા રહીને પણ વિચારોમાં એકબીજાની સાવ નજીક હોવાની આ પરમ અનુભૂતિ હૃદયને હચમચાવી મૂકે તેવી છે. છેલ્લે પેલો અનંતનો સદાબહાર શેર"ઉમ્ર ભર મિટતી નહીં 'અનંત' યે દો ભૂખ..."આખી રાતની ચર્ચા પર સોનામાં સુગંધ ભેળવી દે છે.
આજે તો તેં આખો કિસ્સો બહુ જ સુંદર રીતે સેર કર્યો પ્રિયે! હવે આ આખી મધરાતની ફિલોસોફી વાંચીને પછી, પેલી ઘોઘી જે અધૂરું મૂકીને ગઈ હતી કે"ઘોઘા, તૂ..."એ વાર્તાના પાના આગળ ક્યારે ખોલવા છે?
મે કહ્યું ભૈ મને ક્યારે શું લખ્યું કહ્યું કૈ યાદ નથી હોતુ, હું તો જ્યારે નવરો પડું ત્યારે ભાઈધોના વર્ષો પહેલાં લખેલા કાગળીયા નો થપ્પો લૈન બેસી જાવ છું પછી જે કાગળ હાથ માં આવે તે ઉકેલી ને આયાં કણે મુકી દૌ પછી મને કાંયજ યાદ ન હોય કે ક્યારે શું ઉકેલી ને અહીં મુક્યું એટલે તો ઘણી વાર એક ના એક કાગળ બે કે તેથી વધુ વખત પણ અહીં અલગ અલગ રીતે જોવા મળે એવુય બને અને, ઘણા અધુરા ઉકેલેલા કાગળ માં નો આગળ નો કિસ્સો મા હિસ્સો ફરી ક્યારેય આગળ ન વધે એવુ પણ બને... ખૈર તું કહે છે તો "ઘોઘી જે અધૂરું મૂકીને ગઈ હતી કે"ઘોઘા, તૂ..."એ વાર્તાના કાગળ શોધીશ અને મળશે આગળ વધીશ...


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