धीरे धीरे अँधेरा गहेरा हो रहा था और में चाय बनाके निकल पड़ा उसी खंडर की और ....
सुम शान गलिसे गुजरके में पहोंच गया महोल्ले में
दरवाजा हमेशा की तरहा आधा खुल्ला था ....
में अपने जिश्म को समेटे हुवे अंदर चला गया ..
अनंत और अज्ञानी अपनी अपनी जगह संभाले हुवे चाय का इन्तजार किये बेठे थे ..
मेरे भीतर जाते ही बो बोले यार बहोत देर करदी तूने आज यहाँ आने में ...
अपनी जगह संभालते हुवे और चाय की किटली टिपोय पर रखके मेने कहा
हा यार थोडा रास्ते में रुक गया ...
अनंत चायकी पियाली भरने लगा और बोला परिया ...
देर रात इधर उधर रुका ना कर ...
सीधा यहाँ आ जाया कर वर्ना कभी मुशीबत हो जायेगी ...
बाकी कहानी फिर कभी....
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